जलवायु परिवर्तन में समाज की भूमिका
DOI:
https://doi.org/10.68219/t26gby05Keywords:
जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय परिवर्तन, सतत विकास, सामाजिक सहभागिताAbstract
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन विश्व समुदाय के समक्ष उभरती हुई सबसे गंभीर पर्यावरणीय एवं सामाजिक चुनौतियों में से एक है। इसके व्यापक प्रभाव वैश्विक ऊष्मीकरण, बाढ़, सूखा, वायु एवं जल प्रदूषण, अम्लीय वर्षा, ओजोन परत के क्षरण तथा जैव विविधता में गिरावट के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ ही भूजल स्तर में निरंतर कमी, प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित उपयोग तथा पर्यावरणीय क्षरण मानव जीवन, स्वास्थ्य एवं सामाजिक संरचना को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न परिस्थितियों ने अनेक प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, खाद्य असुरक्षा, जल संकट तथा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को और अधिक गंभीर बना दिया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विश्व का कोई भी देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से अछूता नहीं है। विशेष रूप से समाज के संवेदनशील एवं संसाधन-निर्भर वर्ग इसके प्रतिकूल प्रभावों का अधिक सामना कर रहे हैं। ऐसे में जलवायु लचीलेपन (Climate Resilience) का निर्माण सतत विकास की दिशा में एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों की प्राप्ति तथा निर्धारित समय-सीमाओं के अनुरूप प्रभावी क्रियान्वयन के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहु-हितधारक सहयोग की आवश्यकता है। इसमें राज्य, स्थानीय समुदाय, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र तथा विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के सामाजिक आयामों का विश्लेषण करना तथा जलवायु लचीलेपन के निर्माण में समाज की भूमिका का अध्ययन करना है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण संरक्षण, जनजागरूकता, सामाजिक सहभागिता, नीतिगत समन्वय तथा सामुदायिक स्तर पर अपनाई गई सतत विकास रणनीतियाँ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। अतः जलवायु संकट से प्रभावी रूप से निपटने के लिए समाज आधारित समन्वित दृष्टिकोण एवं दीर्घकालिक कार्ययोजनाओं का विकास समय की प्रमुख आवश्यकता है।
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